बुधवार, 30 नवंबर 2022

गीत (मीत प्रथम अभिसार अमर हो)

 मीत प्रथम अभिसार अमर हो

यह सुरम्य संसार अमर हो। 

नेह-तन्तु ने तुमको जोड़ा

वह जीवन का तार अमर हो।।

पुनः पहाड़ों से निसृत यह, बहे प्रेम की गंगा अविरल

झरते रहें नेह-निर्झर नित, पग-पग पर सरसे ध्वनि कल-कल।

मानवती हो घड़ी प्रणयिनी, मधुरिम यह रसधार अमर हो।


पथ हो सहज सुगम सुंदरतम, खिले रहें मन-सुमन तुम्हारे 

सदा समर्पण साथ निभाए, चाह, सतत आरती उतारे।

ठहरे रहें रूचिर मधुऋतु क्षण, यह शुचि अनहद प्यार अमर हो।


निशि-बासर हो गति प्रगतिमय,सुख-समृद्धि भरे कुलांचें

पावन शीतल साथ तुम्हारा ,दूर करे कटुता की आँचें।

एक-दूसरे की आँखों में, पाई जो, मनुहार अमर हो।

मीत प्रथम अभिसार अमर हो... 

©️सुकुमार सुनील

मंगलवार, 29 नवंबर 2022

गीत (रंग-रँगीला अम्बर)

 रंग-बिरंगी धरा हुई है

रंग-रँगीला अम्बर

दशों-दिशाएँ फाग सुनाएँ

नाचें मंथर-मंथर।


डाल-डाल पर मस्ती छाई झूम रहे वन-उपवन

अलसी खनके और चने के पदचापों में रुन-झुन। 

महक रहा महुआ आमों का अंग-अंग बौराया 

अहा! पलाशों की फुनगी पर होली का मद छाया। 


कोयल घोल रही कलरव में अपना मधुरिम गान

सुन आँगन-घर बाग-विपिन से नीरवता छूमंतर।....

रंग-बिरंगी धरा हुई है रंग-रँगीला अम्बर... 


तन-मन में उन्माद जगा है बाल-वृद्ध-योवन के

सम्मोहन भर रहा कुलांचें पंख लगे बचपन के।

मनभावन के रंग-रचे हैं मनभावन के सपने

रूप-गाँव के मेले में प्रिय ढूँढें अपने-अपने। 


छलक रहीं हैं नेह-कमोरीं  गैल-गली-दालान

भीग रहे रँग-रस-रिमझिम में सबके पावन अंतर ।....

रंग-बिरंगी धरा हुई है रंग-रँगीला अम्बर ।.... 


ढ़ोल बजाते जुम्मन चाचा और बटेश्वर चँग है

हरबिंदर ने भी बाँधा कस अपना मृदुल मृदँग है ।

लगा एंथनी भी कुछ गाने एक अनोखी धुन से

सा-रे-गा-मा-पा-धा-नी सब साथ लिए चुन-चुन के। 


सारे स्वर मिल करने निकले कटुता का संधान 

हुई प्रवाहित समरसता की सलिल-सलिल अभ्यंतर।....

रंग-बिरंगी धरा हुई है रंग-रँगीला अम्बर ।.... 


नगर-गाँव घट-औघट-पनघट सब पर मधु छाया है

तीक्ष्ण-धूप में जैसे सुख का बादल गहराया है।

बैर-भाव सब हुए तिरोहित सब ही हिले-मिले हैं

चुटकी-भर के इस गुलाल से कितने सुमन खिले हैं।


वर्षों की तकरारें क्षण में भूल गईं सब ध्यान 

प्रीति-फुहारें झरतीं झर-झर रह-रहकर तदनंतर।...

रंग-बिरंगी धरा हुई है रंग-रँगीला अम्बर ।...

©️ सुकुमार सुनील 

सोमवार, 28 नवंबर 2022

गीत (बधाई में तुम्हें कुछ गीत देदूँ)

 सोचता हूँ मैं बधाई में तुम्हें कुछ गीत देदूँ

भाव शब्दों में भरूँ और युग-युगों की प्रीत देदूँ।


अग्नि की कर परिक्रमा जो आचमन तुमने लिए हैं

क्षण जो मंत्रोच्चार के संँग साथ में तुमने जिए हैं।

गाँठ जो बाँधी किसी देवांगना ने शुभ घड़ी में

वह रहे अनवरत गुँथित नेह की अनुपम लड़ी में। 


थिरकतीं हैं सुनके जिसको वेद की पावन ऋचाएं 

सुन सको तुम भी निरंतर मौन वह संगीत देदूँ।... 


कर चुके हो मगन-मन से पुष्पहारों को समर्पित

या कुँवारी माँग में शुचि अमिट वह सिंदूर अर्पित। 

धर हथेली पर हथेली ईश को साक्षी समझकर

सात वचनों का लिया जो आपने संकल्प मिलकर।


पूर्ण हों शुभकामनाएँ व्योम से उर के प्रकीर्णित

पीर पर हरएक तुमको चाहता चिर जीत देदूँ।...


चंदनी अनुभूति वाला अमर वह स्पर्श होवे

उन प्रथम संबोधनों से कल्प तक हर रात शोभे।

महकता शाश्वत रहे वह नम गुलाबों का समंदर

गाँस में गस नेह की हों अंतरों से दूर अंतर


माँगते थे अर्चनाओं में मिले इक-दूसरे को

कल्पनाओं में विचरता वह तुम्हें मनमीत देदूँ। ...

सोचता हूँ मैं बधाई में तुम्हें कुछ गीत देदूँ...

©️ सुकुमार सुनील 

रविवार, 27 नवंबर 2022

गीत (नफ़रत थोड़ी प्यार बहुत है)

 01-11-2021


देख सको तो देखो जग में नफ़रत थोड़ी प्यार बहुत है।


एक नमूना लेकर देखो प्रेमी अपने डलियों भर हैं 

जिनसे अपना मन-मुटाव है वे तो चंद अँगुलियों पर हैं।

गाँव गली घर आँगन चौखट अपनी गैय्या अपना बछरा

देखो खेत मेंड़ बट-छाया कितना अपनापन है पसरा। 


होंगे तो कुछ गैर यहाँ बस अपनों का अम्बार बहुत है। 

देख सको तो... 


थोड़ा चलो और मुड़ देखो सबकुछ अपना सा दिखता है 

जाकर दूर देश में कल्लू सबको अपना ही लिखता है। 

मिट्टी अपनी पानी अपना अपना वतन और है भाषा 

सदा बिछड़कर सीखी हमने अपनेपन की है परिभाषा। 


कुछ रिश्तों में बँधे हुए हम किंतु बड़ा संसार बहुत है। 

देख सको तो ... 


माना सिंधु बहुत है खारा  अग्रगण्य पर नीर लवण से

आईं-गईं बहुत संस्कृतियां सदा सृजन ही विजित क्षरण से

नाहक उलझो दुर्गंधों से आओ बाहर खुली हवा लो

यह भी कोई व्याधि? भला तुम इसकी भी क्या खाक दवा लो? 


नदिया घाटी पर्वत उपवन खुशबू घुली बयार बहुत है।

देख सको तो ...


दृष्टि नहीं संकुचित मीत तो फिर क्यों पीड़ाएं पाते हो?

इस पूरे चर-अचर जगत को नयनों में कमतर लाते हो।

इच्छाएँ बलवती बहुत हैं इनको ऊर्ध्वगमन तक लाओ

सात समंदर मुस्काएँगे पर तो तुम अपने फैलाओ।


जितनी हो सामर्थ्य उड़ो तुम अम्बर का विस्तार बहुत है ।

देख सको तो ...

©️ सुकुमार सुनील

शनिवार, 26 नवंबर 2022

गीत (मृत्यु की आवाज कानों में पड़ी है)

 21-07-2021 कोविड द्वितीय लहर के ताण्डव को देखकर.... 😢 मेरे उर-उदधि से छलका यह प्रलाप *गीत* 🙏


आज मैं अवसाद लिखने जा रहा हूँ

मृत्यु की आवाज कानों में पड़ी है...


सुन सको तो सुनलो तुम हुंकार भरती आ रही है

घोर अट्टाहास करती शौर्य निज दिखला रही है


है रोकना दुर्लभ बहुत सब अस्त्र विष धारे हुए हैं 

और हम सब पूर्व से ही स्वयं में हारे हुए हैं 

भील सन्मुख कृष्ण से असहाय हैं हम

घुट रहा है दम कि प्राणों की पड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


हैं भयाभय गूँज से सारी दिशाएँ और घर-घर में यहाँ मातम पड़ा है 

बाहु ही हैं शिथिल फिर कैसे उठाएँ शस्त्र हर निढाल हो बेसुध खड़ा है। 


दिग्भ्रमित से हो गये हैं यत्न सारे पाँव जैसे दलदलों में गढ़ रहे हैं 

घेर डाले शत्रु ने हैं द्वार सारे और आँखें मूँदकर हम बढ़ रहे हैं। 

साधनों से हैं घिरे निरुपाय हैं पर

आई ज्यों अभिमन्यु की अंतिम घड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


हो चलीं हैं अब विफल सब मंत्रणाएं शत्रुदल द्रुतवेग बढ़ता आ रहा है

छा गया चहुंओर हाहाकार जैसे काल बन विकराल चढ़ता आ रहा है।


आस का विश्वास थर-थर काँपता है नीलकंठी ईश शायद रुष्ट ही है

विष विषाणु का कि हो अब पान कैसे? समझना अपने लिए तो क्लिष्ट ही है। 

है पिरो निर्मित कि जीवन-मोतियों से

बिखरने वाली समय की यह लड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


देख निश-दिन दहकते श्मशान हा! हा! आत्मबल हो क्षीण डोला जा रहा है

तिर रहे तन पार्थिव मंदाकिनी में शेष है जो धैर्य बोला जा रहा है।


हर गली घर गाँव में सुन रुदन, क्रंदन मृत्यु के ही आ रहे विभ्रांत सपने

धिक्! मशीनें दे रहीं अंतिम विदाई स्वयं लाशों से खड़े हैं दूर अपने।

गर्जना घनघोर घर्-घर् नाद करती आ रही प्राचीर पर अनथक चढ़ी है। 

मृत्यु की आवाज... 

©️ सुकुमार सुनील

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

गीत (एक तुम्हारा होने भर को...)

 आज बहुत हारा हारा हूँ

अपनेपन ने ललकारा हूँ।

बाहर हर मुश्किल जीती है

भीतर खुद का ही मारा हूँ।।


शायद मुझसे भूल हुई थी बिना शर्त नेह बाँटा था

छल से युक्त विषम खाई को कोमल स्वप्नों से पाटा था।

हाँ हाँ बड़ी भूल थी मेरी सबको स्वयं सरीखा समझा

इस दिमाग से चलते युग में मैं  उर-पग से था आ धमका।।

 

खाता-बहियों वाले युग में स्मृतियों को स्वीकारा हूँ।......


कहाँ पता था? मुझको आगे इतनी वृहद विषम खाई है

मेरे हिस्से स्रोत-बिंदु से ही पग-पग ठोकर आई है।

अवरोधों को दरकिनार कर हर गुत्थी सुलझाता आया

छद्म-विजय के मोहपाश में खुद को ही उलझाता आया।। 


सारे पर्वत लाँघ गया पर तृण से हारा हरकारा हूँ।......


बहुत मगन था यही सोचकर तुम सप्तम् सोपान चढ़ोगे

तेरा-मेरा भेद भुलाकर साझा लक्ष्य विधान करोगे।

किया पराया तुमने लेकिन तुच्छ सफलता पर इतराकर

इतना भला हँसे तुम इतना नत मम् शीश ज़रा सा पाकर।।


धैर्य धरो! मैं बुझा नहीं हूँ धूल-धूसरित अंगारा हूँ।......


खैर! विजय हो तुम्हें मुबारक मैं प्रसन्न पराजित होकर

बहुत कठिन संबंध बचाना कुछ भी पाकर कुछ भी खोकर।

लघुता का भी अपना कद है प्रभुता को झुकना पड़ता है

जग की रक्षा हेतु ईश को भी बौना होना पड़ता है।।


एक तुम्हारा होने भर को हर समझौते पर वारा हूँ।......

©️ सुकुमार सुनील

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

गीत (जल-जल अक्षर-दीप न जब तक घर-घर में उजियार करेंगे)

 जल-जल अक्षर-दीप न जब तक घर-घर में उजियार करेंगे

अँधियारे मौसम ये तब तक यों ही अत्याचार करेंगे। 


हा! हा! ये निर्दयी निबाले जाने कितना दौड़ाएँगे

जाने कितनी प्रतिभाओं को निर्मम पेट निगल जायेंगे।

जाने कितने स्वप्न रेल के पाँव तले रोंदे जायेंगे

जाने कितने प्राण हवा के झोकों के सँग उड़ जायेंगे।

जब तक अंतर-नेत्र न खुलकर अपना भला-बुरा देखेंगे

तब तक वे परपोषी केवल पशुता का व्यवहार करेंगे।


वरदानों-अभिशापों वाले मनगढ़ंत बँटवारे देखे

श्रमिकों के अनवरत अथक श्रम हारे-से बेचारे देखे।

श्रम को भीख माँगते देखा छल के बारे-न्यारे देखे

लाचारों की लाशों पर उन्मत्त महल-चौबारे देखे।

देख न पाये भोले जन वे चमत्कार की चकाचौंध में

हम जिन पर बलिहारी हैं वे हम पर ही प्रतिवार करेंगें।


देश-धर्म की बातों वाले नए-नए व्यापार चले हैं

भीतर घुप्प अँधेरों वाले घर के द्वारे दिये जले हैं। 

आँखों के कृत्रिम आँसू ने भाव हजारों बार छले हैं

बगुले पीताम्बर ओढे ये काग हंस के रूप ढले  हैं। 

आश्वासन की विजय पताकाएँ अम्बर को चूम रहीं हैं

ऐसे में हम छ्द्म विजय ही तो केवल स्वीकार करेंगे।

©️सुकुमार सुनील

बुधवार, 23 नवंबर 2022

गीत (श्रीराम रुष्ट हो जाएँगे)

मर्याद छोड़कर हिंसा में शुचिता के स्वर खो गए अगर

अंतर-सीता का हरण हुआ श्री राम रुष्ट हो जाएँगे।


यह अहम् ईश का भोजन है शुचि स्वयं राम बतलाते हैं

तन का मन का या हो धन का उस पर प्रभु वाण चलाते हैं।


प्रभु राम नाम पावन पुनीत चल प्रेम सहित सुमिरन करलें

इन उन्मादी जयगानों में शुचि शील नष्ट हो जाएँगे।


वे सिंधु स्वयं करुणा के हैं रक्षक सम्पूर्ण चराचर के

वे युद्ध भूमि में भी रिपु को समझाते नीति बिठाकरके


हैं राम राम के स्वयं इष्ट आ बैठ के राम भजन कर लें

सहदम्भ कुटिल उच्चारण में संयम विनिष्ट हो जाएँगे।


उनके चरित्र और जीवन में हिंसा का कोई नहीं ठौर

वे कृपावंत वे गुणागार वे नेह-विमल शुचि-धैर्य-धार


वे अगम अगोचर अविनाशी चल चिंतन और मनन करलें

इन मदमाते जयघोषों में अनुबंध क्लिष्ट हो जाएँगे।

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     ©️सुकुमार सुनील

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

गीत (तुम ही एक किनारा माँ)

 जब-जब तुम्हें पुकारा माँ

तुमने  आ  पुचकारा  माँ।

कहने को तुम साथ नहीं पर

शाश्वत साथ तुम्हार माँ।।


जब-जब मैं अटका भटका हूँ

दुबिधा सूली पर लटका हूँ।

तब-तब गोदी में सिर रखकर

तुमने मुझे दुलारा माँ।


चिंता ने आकर ललकारा

या पथ बाधा ने दुत्कारा।

शीतल सा महसूस किया तब

सिर पर हाथ तुम्हारा माँ।


हर उलझन से भरी घड़ी में

पीड़ाओं की सतत झड़ी में।

राहत वाली मरहम लेकर 

तुम ही बनीं सहारा माँ।


तुम ही साँसों की संचालक

तुम ही प्राणों की प्रतिपादक

जीवन की इस विषम नदी में 

तुम ही एक किनारा माँ।

जब-जब तुम्हें पुकारा माँ.... 

©️ सुकुमार सुनील 

सोमवार, 21 नवंबर 2022

गीत (पुरवाई का जल पर तिरना)


                    सरल नहीं इतना भी होता

इच्छाओं का पार उतरना।


श्वेद-सरित में नहा-नहाकर तन को श्रम में दहा-दहाकर

कोश-कोश कंचन कर डाला निशि-दिन आँसू बहा बहाकर 

मंदिर में अर्चना करीं तो मस्जिद में माथे टेके हैं

फिर भी तो हर असफलता ने कहा भाग्य के ये लेखे हैं।

सौ-सौ बार उसी दलदल से अनचाहे ही पड़ा गुज़रना।....


कितने सूर्य-ताप झेले हैं रौब चाँदनी ने पेले हैं

अनऋतु की बरसात हवाओं ने भी विकट खेल खेले हैं

पथ-बाधायें अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं हैं सीना ताने

और समय भी बुनता देखा नित कष्टों के ताने-वाने

किन्तु आत्मबल भूल सका कब विषम जाल के तन्तु कुतरना...


साहस कितनी बार चुका है आशाओं का शीश झुका है

जीत-हार के द्वंद्व युद्ध में कोमल मन हरबार दुःखा है 

पाने की अति उत्कंठा में खोते कितनी बार गये हैं

प्रतिज्ञायें कितनी टूटीं कितने ही संकल्प ढये हैं।

जोड़-जोड़ जो करी इकठ्ठी सांत्वना को पड़ा विखरना....


बादल सा छाना मँडराना किन्तु धरा पर बूँद न आना

कितनी बेचैनी देता है उमस बढाकर फिर उड़जाना

हर प्रयास निरर्थक पाकर कितनी घबराहट होती है

आकुल अंतर-धरा विलखती सहमी सी घुट-घुट रोती है।

ढाढस बँधा दिया करता है पुरवाई का जल पर तिरना...

©️®️सुकुमार सुनील

रविवार, 20 नवंबर 2022

गीत ( याद रहा है पल-पल मुझको दीपों सा बुझ-बुझ जलना)


 झंझाएँ झुँझला-झुँझलाकर पग-पग सन्मुख आईं पर

याद रहा है प्रतिपल मुझको दीपों सा बुझ-बुझ जलना।


मुस्कानों की शक्ति सघनतम अपने पास अपरिमित है

अश्रु! अश्रु से भी क्या जिनकी क्षणभर उम्र कदाचित है।


कितने उल्कापिण्ड गिरे इस शस्यश्यामला बसुधा पर 

सदा अपेक्षित रहा किन्तु वह बूँदों का टिप-टिप गिरना।

याद रहा है प्रतिपल मुझको दीपों सा बुझ-बुझ जलना।.. 


मृत-मृग चर्म भस्म कर देती फूँक-फूँक फौलाद कठिन 

सन्मुख जीवित स्वाँस ऊष्म के बाधा कौंन खड़ी हो तन।


कितने ही नग सीना ताने अड़े रहे अपनी हठ पर

विजयी हुआ किंतु माँझी का ले कुदाल कण-कण लड़ना।

याद रहा है प्रतिपल मुझको दीपों सा बुझ-बुझ जलना।.. 


संकल्पों के दृढ घेरे से कौन अलभ मंजिल होगी

कूदा वही सिंधु में जिसको प्राणों से ऊपर मोती।


आत्म-मुग्ध तो अम्बर भी था अपनी अगणित ऊँचाई पर

किंतु सीखकर ही माने हम पंख लगा फर-फर उड़ना।

याद रहा है प्रतिपल मुझको दीपों सा बुझ-बुझ जलना।...

©️सुकुमार सुनील

शनिवार, 19 नवंबर 2022

गीत (हम ने हर इक कटु प्याले को पीना सीखा है)

सदा स्वयं पर निर्भर रहकर जीना सीखा है

हमने हर इक कटु प्याले को पीना सीखा है।


यहाँ समस्याओं ने निशि-दिन डेरा डाला है

पर हमने साहस से बढ़कर इनको टाला है।

कोई व्याधि विसंगति कब सन्मुख टिक पाई है?

हर एक समर विजयी होंगे सौगंध उठाई है।


सच के पथ पर अपनी धुन में चलने हेतु सदा 

नशा जोश का करना भीना-भीना सीखा है। हमने...


कितनी बार मृत्यु ने आकर जंघा पीटी है

सारे शाश्वत चिन्ह मिटाने  रेखा खींची है।

पर सावित्री के वंशज यम से भी लड़ते हैं

हर एक असंभव को संभव करने चल पड़ते हैं।


स्वयं काल को बाँध कलाई में कर आभूषण 

हर युग के मस्तक पर जड़ना मीना सीखा है। हमने...


हमने अंतरिक्ष भेदा है सागर लाँघे हैं

वायु पटल पर बिना डिगे हम सरपट भागे हैं।

बिना अस्त्र के भी लड़ लेते हम दुश्मन से युद्ध

किंतु प्रेम के सन्मुख नतसिर हम हैं शुद्ध प्रबुद्ध।


छल से विलग रहेंगे तन-मन प्राणों का प्रण है 

परिश्रम में करना इक खून-पसीना सीखा है। हमने...

©️ सुकुमार सुनील 

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

गीत (वही पुराना प्यार बहे फिर)

मेरे गाँव गली घर-घर में वही पुराना प्यार बहे फिर।


मौन हुए बतियाते आँगन चहल-पहल करती चौपालें

गलियों ने सन्नाटे साधे पगडंडीं काँधे से डालें।

द्वार-द्वार के होठ सिले हैं ड्योढी-ड्योढी में अनबन है

छप्पर और छत्त में झगड़ा क्रंदन हर टटिया के मन है।


बहुत हुआ ओ पीपल! ओ वट! तुम ही थोड़ा बदलो करवट

हिला-डुलाओ अपने पत्ते सीरी-सीरी ब्यार बहे फिर।


साँस-साँस गीली-गीली है चाल-चाल ढीली-ढीली है

आँख आँख में लालामी है हर सूरत पीली-पीली है।

हथियारों से बँधे मुकद्दर कब तक क्रांति बीज बोयेंगे

नवजातों के स्वप्न सलोने कब तक छुप-छुप कर रोएँगे।


क्रोध तुम्ही कुछ ग़म खा जाओ, उनमादों को बस में लाओ

संबंधों की सूनी रग-रग में सुरभित रसधार बहे फिर।


खेतों में शत्रुता उगी है मेंड़, मेंड़ पर आँख तरेरे

सबका अपनापन खोया है लोग हुए हैं तेरे-मेरे

पनघट ने चुप्पियाँ साधलीं घूँघट के पट आग उगलते

अनगिन प्रश्न खड़े हैं सन्मुख मन में ठाड़े बैठे चलते।


खुद से ऊँचे अहम् हुए हैं क्षमा तुम्हें ही जगना होगा

सुखमय स्वप्निल सृजन पंथ को यह विखरा संसार गहे फिर।

©️सुकुमार सुनील

गुरुवार, 17 नवंबर 2022

गीत (हम जीभर कर भेंट न पाए)

 मन से मन को मेंट न पाए

हम जीभर कर भेंट न पाए। 

जग में इतना प्यार हमीं क्यों

जाने भला समेंट न पाए।।


जल में दीपक विम्ब सरीखे

तुम तो पल-प्रतिपल जगमग थे।

लहरों से अठखेली करते

भूल गए सारा अग-जग थे।

झंझाओं से डरकर हम ही

नौका पर आसीन हो गए 

हाथ हमारे ही द्युति पाने

जल में गहरे पैठ न पाए।


चुपके से पल्लव पर उतरे

तुम पावन प्रातः के मोती।

नील-गगन सा गात तुम्हारा

पहने पीत किरन की धोती।

कटु कलुषित स्पर्श हमारा

छूकर छूमंतर कर डाला

दिव्य दीप्ति शुचिता पूरित वह

शापित नेत्र समेट न पाए।


तुमने फूल-फूल महकाया

कलियों पर योवन बर्साया।

नाना रूप और रंगो से

जग को सुंदर-सुगढ़ बनाया।

अभिशापित अपना ही अंतर

ऊपर ओढ़े मैली काया 

हम हीं निपट मूँढ कंचन के

शुचि साँचे में बैठ न पाए।

©️ सुकुमार सुनील 

बुधवार, 16 नवंबर 2022

गीत (अब ढूँढ रहे हैं नयन उन्हें)

 अब ढूँढ रहे हैं नयन उन्हें क़ातर नज़रों से रो-रो कर ।

इस आज़ादी को थमा हमें जो चले गए खुद को खो कर।।


वे सच्चे राष्ट्रभक्त जिनकी रग-रग में राष्ट्र समाया था

तन-मन-धन और जीवन क्षण-क्षण प्रति काम राष्ट्र के आया था

कुछ अग्निवेश कुछ नीर-विमल कुछ भीष्म और कुछ अर्जुन थे

तो तोड़ा कुछ ने चक्रव्यूह रण में अभिमन्यु हो हो कर।


जब तक सीने में जान  रही शुचि अधरों पर मुस्कान रही

जिव्हा पर अंतिम क्षण वंदे मातरम् जय हिंदुस्तान रही

वे मातृभूमि के मतवाले  शुचि स्वयं सुमन थे अर्चन थे

निज प्राणों को ही पिरो गये इस राष्ट्रमाल में धो-धो कर।


हो गया तिरंगा धन्य जिन्हें पाकर गंगा तक हुई विमल

वे शिलालेख स्वर्णिम अक्षर लिख धरा जिन्हें यह हुई सुफल

इतिहास के मटमैले पन्ने पा हुए कि जिनको कंचन थे

जो राष्ट्रप्रेम के बीज गये मन की वसुधा में बो-बो कर।

अब ढूँढ रहे हैं नयन उन्हें क़ातर नज़रों से रो-रो कर ।

©️ सुकुमार सुनील 

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

गीत (अपनी आँखों ने आँसू स्वीकारे हैं)

 हम जग में जीते हैं घर में हारे हैं


 हम तप-तप कर बड़े हुए हैं

हम गिर-गिर कर खड़े हुए हैं

संघर्षों से बहुत लड़े हैं

कितने ही प्रतिमान गढ़े हैं

युद्ध क्षेत्र में दुश्मन पर हुँकारे हैं

लेकिन अपनों के सन्मुख  बेचारे हैं।


गीत अहिंसा के हम गाने वाले हैं

शरणागत वत्सल हैं हम रखवाले हैं

प्रेम पगे हैं फूलों से मुस्काते हैं

परिश्रम करके अपनी क्षुधा मिटाते हैं

अपनी आँखों ने आँसू स्वीकारे हैं

फिर भी अपने आस-पास अंगारे हैं।


जाने कितनों से लोहा  मनवाया है

कितने शिखरों पर परचम लहराया है

सिंहों के दाँतों को गिनते आए हैं

भरत भूमि हम तब भारत कहलाए हैं

दूर-देश तक अपने जय-जयकारे हैं

अपनों ने ही पर घर में दुत्कारे हैं।

©️ सुकुमार सुनील 

सोमवार, 14 नवंबर 2022

गीत (परछाइयों से प्यार जैसे)

रोटियों की परिधि में सब थम गया है यार जैसे

उछलता संसार जैसे, प्यार का वह ज्वार जैसे।


गगन को छूने की ज़िद थी पर धरा से कट गये हम

थोड़ा इसके थोड़ा उसके टुकड़ा टुकड़ा बँट गये हम

मूलतः इस ज़िंदगी का मान क्या? जाता रहा

मिट गयी मनुहार जैसे, खुद की खुद से हार जैसे। 


भूख और तृप्ति का अंतर हाथ भरने नित-निरंतर

मंदिरों और मस्जिदों में पाँव भी भटके हैं दर-दर

आस्थाएँ स्वार्थ पूरित मैं भजन गाता रहा

कामना के द्वार पर हो श्रृद्धा का व्यापार जैसे।


 चलते-चलते आ गए हम स्वयं से भी दूर कितने

नयन मृग-मारीचिका में नीर के हों तीर जितने

अब गया दुःख अब मिला सुख भ्रम यही छलता रहा

नेह तज निज देह से परछाइयों से प्यार जैसे।


 है केन्द्र बेचारा अकेला त्रिज्यायें अनगिनत हैं

केन्द्र से ही परिधि पर यह केंद्र भी परिध्यानुगत है

बस यही अनुवंध का जंजाल उलझाता रहा

छद्म यह संसार जैसे, लोक यह व्यवहार जैसे।

उछलता संसार जैसे प्यार का यह ज्वार जैसे। 

©️ सुकुमार सुनील 


रविवार, 13 नवंबर 2022

गीत (ढूँढो रावण की नाभि कहाँ?)

दुष्कर्म भरे हुंकार जहाँ

पग-पग पर पापाचार जहाँ।

हम कैसे कहदें सूरज है?

चहुँदिशि पसरा अंधियार जहाँ।


केवल इतिहासों को पढकर हम आत्ममुग्ध कब तक होंगे?

उस पूर्व पुरातन शुचिता पर ही बस गर्वित कब तक होंगे?

इस देवतुल्य शुचि वसुधा का हो लेशमात्र भी ध्यान तुम्हें,

इस ज्ञानकुण्ड तप-स्थल पर हो रंचमात्र अभिमान तुम्हें।

तो किसी विभीषण से मिलकर ढूँढ़ो रावण की नाभि कहाँ?


यह जीर्ण-शीर्ण होती संस्कृति जिस दिन गौलोक सिधार गई,

हा! पतित पावनी सीता माँ रावण के सम्मुख हार गई।

यह भरत-भूमि सारे जग में धिक्कार सहेगी निश्चित है,

यदि राम स्वयं संदिग्ध हुए तो फिर भारत क्या भारत है!

लो अभी समय है फिर कोई पा  सका समय से पार कहाँ?


यह अवसरवादी रंग महज़ इस राजनीति से उड़ जाए

संभव है फिर से गीता में अध्याय नया इक जुड़ जाए।

फिर कोई दुःशासन दुर्योधन दुस्साहस नहीं जुटायेगा

नहीं चौराहे पर द्रौपदि का यूँ चीर हरण हो पाएगा।

रक्षक यदि कृष्ण सरीखे हों फिर होगा अत्याचार कहाँ?

©️ सुकुमार सुनील 

9258704656

शनिवार, 12 नवंबर 2022

गीत ( अरुण अधर पर प्रबल प्यास है)


अरुण अधर पर प्रवल प्यास है।

पैरों में बेड़ियाँ पडी हैं
मुझको लेकिन चलना होगा।
उच्छवास की तप्त ज्वाल पर 
जैसे खुद को तलना होगा।

पूर्व, जन्म से ही मर जाए
उसको प्रीति नहीं कह सकते।
बिन स्वासों के स्पन्दन भी
ये गतिमान नहीं रह सकते।

पाकर ही विश्राम करेगी
उर से जागी मधुर आश है....

राहों को अवरुद्ध करें जो
युग के बाँध ढहें ढह जाएं।
अंतस के अविरल सम्बोधन
कैसे बिना सुने रह पाएं?

आहों की आबाज सुनूँ तो
सन्मुख तेरी छवि आती है।
चाह बाबरी हो पल प्रतिपल
तेरे गीत-गज़ल गाती है।

जलता तुम कहदो मरुथल पर
मेरे दृग में मधुरमास है.....

आओ मिलकर पर्व मनाएं
मन में दीपावली जली है।
शांत भुवन में क्यों चुप बैठें
महकी-महकी गली-गली है।

व्यर्थ न जाने दो यह धुन जो
दिल के इकतारे ने छेडी।
जीने दो इन अरमानों को
माना राह बहुत है टेडी।

अंधकार! इससे क्या डरना?
अंदर अपने जब प्रकाश है।...

अरुण अधर पर प्रवल प्यास है।...
@ सुकुमार सुनील 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

गीत (मैं हिन्दी हूँ)

मैं गंगा की अविरल धारा
मैं सरयू हूँ   कालिन्दी  हूँ
मैं हिंदी हूँ  मैं हिंदी हूँ मैं हिंदी हूँ मैं हिंदी हूँ
मैं हूँ देवों की दिव्य गिरा
मैं राम-कृष्ण की वसुंधरा
मैं महावीर की जिनवाणी
मैं 'बुद्धं शरणं गच्छामी'
मैं ही श्रीजी की अधर काँति
मैं सीता माँ की बिन्दी हूँ ।मैं हिंदी हूँ 2
मैं हाला हूँ मधुशाला हूँ
मैं 'बच्चन' की मधुबाला हूँ
मैं सूरदास की दिव्य दृष्टि
मैं हूँ मीरा की प्रेम वृष्टि
तुलसी की रामचरितमानस
रविदास की चंदन चिंदी हूँ । मैं हिंदी हूँ 2.            
मैं पावन काशी की आभा
मैं हूँ वृंदावन की शोभा
मैं रामचंद्र की मौन वृत्ति
मैं हूँ कान्हाँ की किलकारी
मैं विश्वमोहिनी रसवंती
मैं रिद्धि हूँ मैं सिद्धी हूँ । मैं हिंदी हूँ 2.                  
मैं गंगा की अविरल धारा
मैं सरयू हूँ कलिन्दी हूँ
मैं हिंदी हूँ मैं हिंदी हूँ 2
  ©️ सुकुमार सुनील 

    9258704656

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

छंद (हिंदी)

 यद्यपि अक्षम नहीं आँग्ल-भाषा बोलने में

किंतु मातृभाषा निज हिंदी मन भाती है।

व्याकरण शैली सब सीखे अँगरेजी के भी

भाव को सहेज पर हिंदी रखपाती है।

द्वेष तो नहीं है मीत भाषा किसी से भी पर

रसना को रसभीनी हिंदी ही सुहाती है।

सेवा का विधान कुछ जानता नहीं हूँ और, 

बोलने में हिंदी बस शर्म नहीं आती है।।

©️ सुकुमार सुनील 

बुधवार, 9 नवंबर 2022

छंद (कविता)

 कविता के आँगन में अक्षरों के लेके पुष्प

शब्द के जलाए दीप लाया स्वीकारिए।

भाव नहीं भाषा नहीं और कोई आशा नहीं

कामना को मेरी निज चरणों में धारिए।

सुना है गुना है तब आपको चुना है शुचि

मेरी क्षीण साधना को आप ही सँवारिए।

लिख सकूँ भूख और पीड़ा के सलौने गीत

काव्य-सरिता को मात मुझमें उतारिए।।

©️सुकुमार सुनील 

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

छंद (कविता)

 निज रक्त सींच-सींच आँचल में भींच-भींच

मात सम प्राण-रस घोलती है कविता।

वर्ण-वर्ण कृष्ण सम शब्द-शब्द प्रीति रीति

रोम-रोम राधा-राधा बोलती है कविता।

सरहदों पे काल की भी आँख से मिलाके आँख

प्राण से वतन को जी तोलती है कविता।

आता है शहीद जब ओढ़ के तिरंगा मीत 

हिय प्रियतमा का टटोलती है कविता।।

©️सुकुमार सुनील 

सोमवार, 7 नवंबर 2022

छंद (तिरंगा)

 ईसाई की प्रेयर है हिंदू का है वेदमंत्र

मोमिनों को पाक सी अज़ान ये तिरंगा है।

बुद्ध का है त्रिपिटक जैनियों की जिनवाणी

सिक्खों का जी गुरुग्रंथ गान ये तिरंगा है ।

तीन रंग में विलीन धर्म संप्रदाय सारे

मध्य चक्र प्रगति विधान ये तिरंगा है। 

बंधुता में बाँधे मीत साधना में साधे हुए 

एकता में पूरा हिंदुस्तान ये तिरंगा है ।।

©️ सुकुमार सुनील

रविवार, 6 नवंबर 2022

छंद (तिरंगा)



 अगणित अधरों पे छाया मुस्कान बन

जन-गण-मन की जी शान ये तिरंगा है।

गौरव करें भी हम तो क्या अहसान कोई?

तन्तु-तन्तु गौरव का गान ये तिरंगा है।। 

मौत के भी डाल आँख आँख में करें जो बात

देश के प्रहरियों की जान ये तिरंगा है।

शौर्य शक्ति शांति यही यही समृद्धि मीत

सच पूछो भारत के प्रान ये तिरंगा है।।

©️ सुकुमार सुनील 

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