सोमवार, 14 नवंबर 2022

गीत (परछाइयों से प्यार जैसे)

रोटियों की परिधि में सब थम गया है यार जैसे

उछलता संसार जैसे, प्यार का वह ज्वार जैसे।


गगन को छूने की ज़िद थी पर धरा से कट गये हम

थोड़ा इसके थोड़ा उसके टुकड़ा टुकड़ा बँट गये हम

मूलतः इस ज़िंदगी का मान क्या? जाता रहा

मिट गयी मनुहार जैसे, खुद की खुद से हार जैसे। 


भूख और तृप्ति का अंतर हाथ भरने नित-निरंतर

मंदिरों और मस्जिदों में पाँव भी भटके हैं दर-दर

आस्थाएँ स्वार्थ पूरित मैं भजन गाता रहा

कामना के द्वार पर हो श्रृद्धा का व्यापार जैसे।


 चलते-चलते आ गए हम स्वयं से भी दूर कितने

नयन मृग-मारीचिका में नीर के हों तीर जितने

अब गया दुःख अब मिला सुख भ्रम यही छलता रहा

नेह तज निज देह से परछाइयों से प्यार जैसे।


 है केन्द्र बेचारा अकेला त्रिज्यायें अनगिनत हैं

केन्द्र से ही परिधि पर यह केंद्र भी परिध्यानुगत है

बस यही अनुवंध का जंजाल उलझाता रहा

छद्म यह संसार जैसे, लोक यह व्यवहार जैसे।

उछलता संसार जैसे प्यार का यह ज्वार जैसे। 

©️ सुकुमार सुनील 


5 टिप्‍पणियां:

अनिता ने कहा…

बिल्कुल सही बात

बेनामी ने कहा…

Bht khoob

बेनामी ने कहा…

Very Nice

Sukumar Sunil ने कहा…

बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद मैम 🙏

बेनामी ने कहा…

Nice sir

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