शनिवार, 26 नवंबर 2022

गीत (मृत्यु की आवाज कानों में पड़ी है)

 21-07-2021 कोविड द्वितीय लहर के ताण्डव को देखकर.... 😢 मेरे उर-उदधि से छलका यह प्रलाप *गीत* 🙏


आज मैं अवसाद लिखने जा रहा हूँ

मृत्यु की आवाज कानों में पड़ी है...


सुन सको तो सुनलो तुम हुंकार भरती आ रही है

घोर अट्टाहास करती शौर्य निज दिखला रही है


है रोकना दुर्लभ बहुत सब अस्त्र विष धारे हुए हैं 

और हम सब पूर्व से ही स्वयं में हारे हुए हैं 

भील सन्मुख कृष्ण से असहाय हैं हम

घुट रहा है दम कि प्राणों की पड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


हैं भयाभय गूँज से सारी दिशाएँ और घर-घर में यहाँ मातम पड़ा है 

बाहु ही हैं शिथिल फिर कैसे उठाएँ शस्त्र हर निढाल हो बेसुध खड़ा है। 


दिग्भ्रमित से हो गये हैं यत्न सारे पाँव जैसे दलदलों में गढ़ रहे हैं 

घेर डाले शत्रु ने हैं द्वार सारे और आँखें मूँदकर हम बढ़ रहे हैं। 

साधनों से हैं घिरे निरुपाय हैं पर

आई ज्यों अभिमन्यु की अंतिम घड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


हो चलीं हैं अब विफल सब मंत्रणाएं शत्रुदल द्रुतवेग बढ़ता आ रहा है

छा गया चहुंओर हाहाकार जैसे काल बन विकराल चढ़ता आ रहा है।


आस का विश्वास थर-थर काँपता है नीलकंठी ईश शायद रुष्ट ही है

विष विषाणु का कि हो अब पान कैसे? समझना अपने लिए तो क्लिष्ट ही है। 

है पिरो निर्मित कि जीवन-मोतियों से

बिखरने वाली समय की यह लड़ी है। 

मृत्यु की आवाज...


देख निश-दिन दहकते श्मशान हा! हा! आत्मबल हो क्षीण डोला जा रहा है

तिर रहे तन पार्थिव मंदाकिनी में शेष है जो धैर्य बोला जा रहा है।


हर गली घर गाँव में सुन रुदन, क्रंदन मृत्यु के ही आ रहे विभ्रांत सपने

धिक्! मशीनें दे रहीं अंतिम विदाई स्वयं लाशों से खड़े हैं दूर अपने।

गर्जना घनघोर घर्-घर् नाद करती आ रही प्राचीर पर अनथक चढ़ी है। 

मृत्यु की आवाज... 

©️ सुकुमार सुनील

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