इच्छाओं का पार उतरना।
श्वेद-सरित में नहा-नहाकर तन को श्रम में दहा-दहाकर
कोश-कोश कंचन कर डाला निशि-दिन आँसू बहा बहाकर
मंदिर में अर्चना करीं तो मस्जिद में माथे टेके हैं
फिर भी तो हर असफलता ने कहा भाग्य के ये लेखे हैं।
सौ-सौ बार उसी दलदल से अनचाहे ही पड़ा गुज़रना।....
कितने सूर्य-ताप झेले हैं रौब चाँदनी ने पेले हैं
अनऋतु की बरसात हवाओं ने भी विकट खेल खेले हैं
पथ-बाधायें अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं हैं सीना ताने
और समय भी बुनता देखा नित कष्टों के ताने-वाने
किन्तु आत्मबल भूल सका कब विषम जाल के तन्तु कुतरना...
साहस कितनी बार चुका है आशाओं का शीश झुका है
जीत-हार के द्वंद्व युद्ध में कोमल मन हरबार दुःखा है
पाने की अति उत्कंठा में खोते कितनी बार गये हैं
प्रतिज्ञायें कितनी टूटीं कितने ही संकल्प ढये हैं।
जोड़-जोड़ जो करी इकठ्ठी सांत्वना को पड़ा विखरना....
बादल सा छाना मँडराना किन्तु धरा पर बूँद न आना
कितनी बेचैनी देता है उमस बढाकर फिर उड़जाना
हर प्रयास निरर्थक पाकर कितनी घबराहट होती है
आकुल अंतर-धरा विलखती सहमी सी घुट-घुट रोती है।
ढाढस बँधा दिया करता है पुरवाई का जल पर तिरना...
©️®️सुकुमार सुनील
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