सोमवार, 21 नवंबर 2022

गीत (पुरवाई का जल पर तिरना)


                    सरल नहीं इतना भी होता

इच्छाओं का पार उतरना।


श्वेद-सरित में नहा-नहाकर तन को श्रम में दहा-दहाकर

कोश-कोश कंचन कर डाला निशि-दिन आँसू बहा बहाकर 

मंदिर में अर्चना करीं तो मस्जिद में माथे टेके हैं

फिर भी तो हर असफलता ने कहा भाग्य के ये लेखे हैं।

सौ-सौ बार उसी दलदल से अनचाहे ही पड़ा गुज़रना।....


कितने सूर्य-ताप झेले हैं रौब चाँदनी ने पेले हैं

अनऋतु की बरसात हवाओं ने भी विकट खेल खेले हैं

पथ-बाधायें अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं हैं सीना ताने

और समय भी बुनता देखा नित कष्टों के ताने-वाने

किन्तु आत्मबल भूल सका कब विषम जाल के तन्तु कुतरना...


साहस कितनी बार चुका है आशाओं का शीश झुका है

जीत-हार के द्वंद्व युद्ध में कोमल मन हरबार दुःखा है 

पाने की अति उत्कंठा में खोते कितनी बार गये हैं

प्रतिज्ञायें कितनी टूटीं कितने ही संकल्प ढये हैं।

जोड़-जोड़ जो करी इकठ्ठी सांत्वना को पड़ा विखरना....


बादल सा छाना मँडराना किन्तु धरा पर बूँद न आना

कितनी बेचैनी देता है उमस बढाकर फिर उड़जाना

हर प्रयास निरर्थक पाकर कितनी घबराहट होती है

आकुल अंतर-धरा विलखती सहमी सी घुट-घुट रोती है।

ढाढस बँधा दिया करता है पुरवाई का जल पर तिरना...

©️®️सुकुमार सुनील

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