सोमवार, 12 दिसंबर 2022

सजल (नीरस मन की ताल हुई है)

 *सजल*

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समांत.    - आल

पदांत.    - हुई है 

मात्रा-भार- 32

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सूनसान-सन्नाटों वाली रात घुप्प विकराल हुई है

चारों-ओर विवशताएँ हैं नीरस मन की ताल हुई है


पल-पल चीख-पुकार-पगा है सतत रक्त-रंजित वसुधा-उर

नीति, शक्ति के पाँव पलोटे न्याय संग विधि ढाल हुई है 


कागों ने मोती पाए हैं हंस विवश उपवास साधने

करुणा शोक-विकल अति आकुल कटुता मालामाल हुई है


देखो प्रेम-गाँव में आकर सब कुछ अस्त-व्यस्त ऊजड़ है

शुष्क मूल है विटप-विटप की पुष्पित कैसी डाल हुई है


चलो चलें झोलियाँ सँभालें खेतों में मोती विखरे हैं

समय-चुनावी, नेह-नीर की वर्षा बहुत विशाल हुई है

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       ©️ सुकुमार सुनील

सजल(अब हम सभी स्वतंत्र हो गए)


दिनांक-15-08-20

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        *सजल*

समांत- अंत्र

पदांत - हो गए 

मात्राभार- 16

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सफल समूचे मंत्र हो गए

अब हम सभी स्वतंत्र हो गए 


देव मान पूजने चले थे

थाल स्वयं षड्यंत्र हो गए


खींच-तान आपाधापी है 

तन-मन सब संयंत्र हो गए 


जीवन बदल रहा है करवट

कलुषित सारे तंत्र हो गए


कुछ पौधे फल-फूल रहे हैं

कहने को गणतंत्र हो गए


उत्कोची पवनें मचलीं हैं 

स्वप्न सभी परतंत्र हो गए


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©️सुकुमार सुनील

           

सजल (मरुथल में सपने बोए हैं)


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        *सजल*

समांत- ओए

पदांत - हैं

मात्राभार- 16

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मरुथल में सपने बोए हैं

आँखों ने आँसू खोए हैं


तुम तुहिन बिंदु मत कह देना 

जाने कितने मन रोए हैं 


चहुँदिशि अंगारे दहक रहे

हम आँख मूँदकर सोए हैं


है नीर विपुल इस सागर में 

पग पर नदियों ने धोए हैं


गर्वित हर नग निज तुंग भाल

सब भार धरा ने ढोए हैं


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©️सुकुमार सुनील

            

सजल ( तब जा वृंदावन होता है)


विषय - संस्कृति 

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        *सजल*

समांत- अन

पदांत - होता है

मात्राभार- 32

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स्मरण मात्र से ही सुरभित यह तन-मन सावन होता है

प्रत्येक कष्ट का माधव के  चरणों में* समापन होता है


कण-कण में शक्ति समाहित है यह भूमि परम अवतारों की

हमने ही* सत्य-शोध समझा यह सत्य सनातन होता है


संस्कृतियों की है मूल-स्रोत वसुधा भारत की देवमयी

हम गरलकंठ के अनुगामी उर-उर अपनापन होता है 


इत पत्र-पत्र पर वेद-ऋचाएँ पढ़ो ध्यान से सर्जित हैं 

शुचि पुष्प-पुष्प पर उपनिषदों का नित आराधन होता है


तृण-तृण हो प्रेम-पगा रज पा आनंद स्वयं आनंदित हो

वह दिव्य धरा का सरस खण्ड तब जा वृंदावन होता है


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©️ सुकुमार सुनील 

रविवार, 11 दिसंबर 2022

सजल (मृत्यु पर हँसने लगे हम)

 *प्रयोग पूर्ति -112*

दिनांक-13-08-20

 दिन-गुरुवार 

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        *सजल*

समांत- अने

पदांत - लगे हम

मात्राभार- 14

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गर्त में धँसने लगे हम

मृत्यु पर हँसने लगे हम


हंस थे संवेदना के

व्याल बन डसने लगे हम


मन मरुस्थल हो गया है

रेत पर बसने लगे हम


चीरकर आए वनों को 

घास में फँसने लगे हम


हैं शिथिल संबंध सारे

स्वयं को कसने लगे हम


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©️ 〰️ सुकुमार सुनील

            फिरोजाबाद

सजल(सपनों में कुछ सुहावने से चित्र मिले हैं)

पदांत - इत्र 

समांत- मिले हैं 

मात्राभार - 24


सपनों में कुछ सुहावने से चित्र मिले हैं

फूलों-से खिलखिलाते हुए मित्र मिले हैं।


बातों में हों उनकी पड़े शहद के छींटे

आचरण में उनके जैसे इत्र मिले हैं।


उतार कर देखी समय के गर्त की परत

स्थान सारे देश के पवित्र मिले हैं


कहानियाँ सुनी-पढ़ीं हैं प्रेमचंद कीं

विविध रंग-ढंग के चरित्र मिले हैं।


धनवंत को मनमानियाँ निर्धन को विवशता

प्रबंध सदा राष्ट्र के विचित्र मिले हैं।


शत्रु ही हैं देश के नेतृत्व में सभी 

'सुकुमार' समझते हो कि सौमित्र मिले हैं।। 

©️ सुकुमार सुनील

सजल(हिन्दी की सशक्त और स्वाभिमानी बेटी : सजल)

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*हिन्दी की सशक्त और स्वाभिमानी बेटी : सजल*


समृद्ध शब्दकोश, समृद्ध साहित्य व विशद-हृदया भाषा हिंदी ने जहाँ विश्व की अनन्य भाषाओं को अपने आँचल की छाया देकर अपनाने का काम किया तो वहीं उन अन्य भाषाओं ने हिन्दी को इतना निर्बल समझा कि उन्होंने हिन्दी को, हिन्दी से परेय हिंदुस्तानी और हिंग्लिश बनाने का भरपूर प्रयास किया। दुर्भाग्य की बात यह है कि स्वयं को हिन्दी के पुत्र कहने वाले असंख्य साहित्यकार, यह सब आँख मूंदकर सहते रहे। तो वहीं हिन्दी की उदार हृदया विधाएँ भी, इस विद्रूपता को सहज स्वीकारतीं रहीं। देखदे ही देखते इन मिश्र भाषाओं ने अपना एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया। अब तक विशुद्ध हिन्दी की वकालत करने वाले चंद साहित्यकार भी   थक-हार कर या यों कहें, उन मिश्रित भाषाओं से प्रेरित होकर उसी धारा में बहने लगे।......

    परन्तु आज हिन्दी के सुरम्य आँचल में पले-बढ़े, हिन्दी के सच्चे सपूतों के प्रणम्य प्रयासों से हिंदी पुनः अपने स्वाभिमान, अपनी समृद्धि के अनंत आकाश को स्पर्श करने के लिए तत्पर ही नहीं, अपितु उसमें विचरण करती हुई दृष्टिगोचर हो रही है।.... 

      हिंदी की विशुद्ध विधा रुपी बेटियों के मध्य जन्मी *सजल*  विधा, हिंदी की एक ऐसी बेटी है, जिसे अपनी माँ की मान-मर्यादा और स्वाभिमान का सम्पूर्ण रूप से ध्यान है। वह विशुद्ध हिन्दी भाषा के शब्द, ढंग/शैली, छंद और व्याकरण के अनुपालन का अक्षरशः ध्यान रखती है। 

     साथ ही *सजल*  रूप, लावण्य और आकर्षण से युक्त एक ऐसी अनिद्य सुंदरी है जिसे देखते/सुनते/पढते ही लेखक और पाठक दोनों को अतीव आनंद की प्रतीति होती है। अतः रचनाकार रचनाधर्म में तो पाठक रसास्वादन में रत हो जाता है। 

    अंत में सजल निःसंदेह हिन्दी की गौरवशाली विधा है। जो न केवल हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रही है, अपितु उसकी विशुद्धता, विशदता और व्यापकता को भी प्रमाणित कर रही है। 

     जय हिंदी 🙏

           जय सजल 🙏


   - सुकुमार सुनील 

     फिरोजाबाद, उ. प्र. 

          भारत

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