सोमवार, 12 दिसंबर 2022

सजल (नीरस मन की ताल हुई है)

 *सजल*

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समांत.    - आल

पदांत.    - हुई है 

मात्रा-भार- 32

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सूनसान-सन्नाटों वाली रात घुप्प विकराल हुई है

चारों-ओर विवशताएँ हैं नीरस मन की ताल हुई है


पल-पल चीख-पुकार-पगा है सतत रक्त-रंजित वसुधा-उर

नीति, शक्ति के पाँव पलोटे न्याय संग विधि ढाल हुई है 


कागों ने मोती पाए हैं हंस विवश उपवास साधने

करुणा शोक-विकल अति आकुल कटुता मालामाल हुई है


देखो प्रेम-गाँव में आकर सब कुछ अस्त-व्यस्त ऊजड़ है

शुष्क मूल है विटप-विटप की पुष्पित कैसी डाल हुई है


चलो चलें झोलियाँ सँभालें खेतों में मोती विखरे हैं

समय-चुनावी, नेह-नीर की वर्षा बहुत विशाल हुई है

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       ©️ सुकुमार सुनील

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