बुधवार, 7 दिसंबर 2022

ग़ज़ल (तुम को जानवर कहा तो जानवर सहम गए)

 😢😢😢

अमानवीयता कुकृत्य के सभी चरम गये

तुमको जानवर कहा तो जानवर सहम गये ।

चीख जल गयी कराह राख में दबी मिली

अस्मिता गयी कि अस्मिता के सब भरम गये।

सबाल जोकि लाजिमी थे उठ खड़े हुए मगर

जवाब में कहर मिला कि तुम गये औ हम गये ।

मज़हबों को राजनीति ने इस तरह छला

आदमी से आदमी के कायदे-नियम गये।

उड़ रहीं हैं इज्ज़तों की धज्जियाँ सरे- बजार

हिफाज़तों में जो बढे कदम कि दो कदम गये।

प्यार की पवित्रता का पृष्ठ तक न पढ सके 

क्रूर-कृत्य करने छोड़ लाज हर शरम गये।

सभ्यता के तुंग भाल पर लिखा था हिंद आज़

"सुकुमार'' अंग-अंग में अनंग रम गये।।

©️ सुकुमार सुनील 

मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

गीत (पास न जिनके आना-पाई)

 अक्षर-अक्षर जले दीप सा शब्द-शब्द मृदु-भोग मिठाई

सुनकर मन जगमग हो जाए ऐसा मधुर गीत दो माई।


जिसमें उत्सव-छटा दीप्त हो जो शुचिता का परिपोषक हो

देहरी-देहरी गंधित कर दे जो पीड़ा का अवशोषक हो

दुविधा में सुविधा बन उतरे हर अभाव में भाव परोसे

जिसको पढ़कर कहीं न सोए भूखा कोई रामभरोसे 

उनकी भी हो शुभ-दीपावलि पास न जिनके आना-पाई।


छद्म भूत-यशगान न जिसमें साँचा गौरवगान स्वरित हो

वर्तमान हो प्रगतिशील नित कल सुखमय हो आशान्वित हो

जिसमें श्रम के श्वेदबिंदु से अभिसिंचित आशा का फल हो

सुलभ सभी को रहें निबाले भले कर्मरत पल प्रतिपल हो

वे भी सौ-सौ दीप जलाएँ जिनके पास न दियासलाई।


स्वयं उतर आए कागज पर  सोख-सोख आँसू की स्याही

स्वयं मुखर हो गाए निस्पृह पीड़ा दुखियों की अनगाई

आकुल अधरों पर धर जाए मंद-मंद मुस्कानें अनगिन 

वह जो मन त्योहारी कर दे और भुला दे सारे दुर्दिन 

धनी और निर्धन की पाटे पल भर में ही चौड़ी खाई।


स्वर्ण-कलश कब सोचे कब हैं मन में रत्नजड़ित आभूषण

पैठे अपने चित्-चिंतन में केवल भूख और भोजन-कण

तृप्ति न दे तो तृप्ति सरीखा जो अतुल्य आभाष जगा दे

तृषा न मेंटे तो पानी में कुछ करने की आग लगा दे। 

और नहीं तो इतना कर दे सिखा सभी को आँखर ढ़ाई। 

©️ सुकुमार सुनील

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

गीत (कहाँ रहतीं थीं तब तुम?)

 ओ माथे की शिकन! कहाँ रहतीं थीं तब तुम?


चारों ओर विषम बाधाएँ हौंस-हौंस नाचा करतीं थीं

सब स्थितियाँ और परिस्थिति पद दुःख के बाँचा करतीं थीं।


सारे दुःख थे, हर अभाव पर एक भाव था भारी लेकिन

साथ हमारे पल-प्रतिपल ही शुचि माँ की ममता थी निश-दिन।


अधरों की मुस्कान और चेहरे का खिलना

कैसे रह चुपचाप भला सहतीं थीं तब तुम?

ओ माथे की शिकन! कहाँ रहतीं थीं तब तुम? 


यों तो रिश्तों में तकरारें सदा-सदा होतीं आईं हैं

झगड़े टंटे अनबन उन्मन संस्कृतियाँ ढोती आईं हैं।


पट जाया करतीं थीं खाईं समारोह के आ जाने पर

हो जाते थे सभी इकट्ठे डाँट-डपट समझा जाने पर।


वह माँ की फटकार खरी से खरी सुनाना

कैसे हो नत-भाल सुना करतीं थीं तब तुम?

ओ माथे की शिकन! कहाँ रहतीं थीं तब तुम? 


कहने भर को ही तो केवल बदल रहे हैं युग तदनंतर

पीड़ाओं की सतत बाहिनी बहती आई नित्य-निरंतर ।


कहाँ सुने थे हृदयघात यों पड़ते हमने चलते-फिरते

सारे मनमुटाव मिटते थे काकी के सिर पर कर धरते। 


एक ओर लेजाकर सबके कानों में कुछ-कुछ फुसियाना

क्यों डर माँ की ऐक्य कला से  गैल अलग गहतीं थीं तब तुम? 

ओ माथे की शिकन! कहाँ रहतीं थीं तब तुम? 

©️ सुकुमार सुनील

रविवार, 4 दिसंबर 2022

गीत ( चल आ बरसाएँ प्यार प्रिए)

 यह कुंठित है संसार प्रिए

 चल आ बरसाएँ प्यार प्रिए।


मधुऋतु है मधु के प्याले हैं मधु का है नाम निशान नहीं

पैमाने सारे खण्डित हैं साखी को कोई भान नहीं।

मद है मदहोशी पसरी है आँखों से आँच बरसती है

शुचि निर्विकार निश्छल मृदु-मन पाने को आँख तरसती है।


चहुँओर उमस बस धूल-धुआँ   है घुटन चुभन व्याकुलता है

गुम्फित हैं धरा-गगन जीवन आ सरसाएँ रसधार प्रिए ।


फागुन है फगुआ रंग नहीं रँग है तो रहबर संग नहीं

चहुँओर शोर है घोर बहुत उर में पर उदित उमंग नहीं। 

काँधों तक काँधे आते हैं पर उर से उर हैं दूर-दूर

अधरों पर छद्म-स्मित शोभित अंतर-अंतर है अहम् चूर।


ईर्ष्या है द्वेष और कटुता विकलांग हो गई समरसता 

इन बचे नेह के ठूँठों पर छितराएँ प्रेम-फुहार प्रिए।


बाहर-बाहर है चकाचौंध अंदर सब खाली-खाली है

बाजारों में त्योहार सजे खेतों की हालत माली है। 

है नयन-नयन धुँधला-धुँधला पलकों पर पर्त उदासी की 

आँगन सूने सूनी गलियाँ है चहल-पहल वनवासी सी।


वैभव सन्मुख नतग्रीव हुए वे हास और परिहास सभी

चल अपनेपन की शीतल बिखराएँ कुछ बौछार प्रिए।

©️ सुकुमार सुनील

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

गीत (अब क्या बादल बरसाए से?)

 सूख चुका तन प्राण मूल मन अब क्या बादल बरसाए से?


वाट जोहते रैना वीतीं रही चाँदनी सदा सालती

सूरज की निर्मोही किरनें अंग-अंग में आग बालतीं।

आँखों में तुम ही तुम थे बस अब क्या आँसू ढलकाए से?


रही हृदय में सदा याचना सारे स्वप्न मूर्त कर दोगे

नेह-मेह अंतर बरसाकर आँचल में खुशियाँ भर दोगे।

स्वासा ही जब मौन हो गई अब क्या अमरित छलकाए से? 


पोर-पोर में प्यास जगी थी रोम-रोम था तुम्हें ताकता 

भूल गया था सुध-बुध सारी सुधियों में भी एक जाप था।

तुम आओगे, पर न आ सके अब क्या यह विप्लव लाए से?


इतनी भी क्या रही व्यस्तता थोड़ा आते-जाते रहते

सूख न पाता कंठ मीत तुम थोड़ा नेह जताते रहते।

तप्त भस्म पर अब क्या प्रियवर पूरा सागर उतराए से?

©️सुकुमार सुनील

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

गीत (हम आशा के अक्षय-पात्र कब रीते? रीते से)

 मन के हारे हार, जीत है मन के जीते से

हम आशा के अक्षय-पात्र कब रीते? रीते से।


हाँ सच है कंटकाकीर्ण है टहनी-टहनी पर

एक सिरे पर इसके ही खुशबू बहती झर-झर।

मीत प्रतीक्षा के क्षण किसको कब देते हैं चैन?

पल-पल व्याकुल हृदय संग तकते राहें दो नैन।


सहज कहाँ जीवन बगिया में प्रिय गुलाब का खिलना

आए किन्तु बहार समय रितु दुर्दिन बीते से।


सदा समस्या लेकर आती कोई नूतन सीख

सीख सीखकर सीख भला क्यों माँग किसी से भीख?

झंझाओं को ही सह पादप पाते हैं जल-वृष्टि

बुनी हुई यह झंझाओं से मीत समूची सृष्टि।


रिमझिम-रिमझिम बरसेंगीं अनुपम अमृत की लड़ियाँ

तपकर ज्येष्ठ-धूप ही सावन होते तीते से।


आँसू का अनमोल खज़ाना खो मत बने उदास

पाँच कर्म और पाँच ज्ञान के आयुध अपने पास।

दिशा निर्देशक मिले साथ में निज बल बुद्धि विवेक

और खड़ा पर्दे के पीछे अनुपम मालिक एक। 


मिली किसी को कहाँ समय से पूर्व हार और जीत

पककर मधुर हुआ करते हैं फल सब फीके से। 

©️ सुकुमार सुनील

गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

गीत (स्वप्न में भी जब तुम्हारा प्रेम पाता हूँ)

 स्वप्न में भी जब तुम्हारा प्रेम पाता हूँ

सच कहूँ सोते हुए भी मुस्कराता हूँ।


अनछुए ही भर लिया हो पाश में जैसे

पुष्प सा वातावरण एहसास में जैसे।

भाव भर उर में सुकोमल याकि वासंती

गीत गुमसुम मैं अबोले गुनगुनाता हूँ।...


उड़ रहा ज्यों आसमानों में तुम्हारे सँग

लग गए हों पर परों में इंद्रधनुषी रँग।

बादलों के झुंड बनकर तन गए हों छत्र 

मैं अ-भीगे प्रीति-पावस में नहाता हूँ।...


नयन भर के मिलन पर ही आम किस्से थे

राह के सँग-सँग हृदय के भी दो हिस्से थे।

देखकर वह बोलती छवि छद्म भर सन्मुख

बोलना मुश्किल बहुत बस देख पाता हूँ।...


चाह पाने की नहीं पा खो दिया जिनको 

क्या करोगे स्वर्ग से आ भुवन भग्नों को।

हो सके आभास भर तुम यह सदा रखना

अनचले मैं दर तुम्हारे नित्य आता हूँ।...


कर्णप्रिय संबोधनों को मुग्धमन मैं सुन 

है असंभव वह निरर्थक मैं रहा जो बुन।

मूँदकर आँखें समय को रोकना दुर्लभ

मूढ़मन मैं यह जतन भी आजमाता हूँ।...


स्वप्न में भी जब तुम्हारा प्रेम पाता हूँ....

©️ सुकुमार सुनील

भारतीय रेल: परिवहन का सुगम साधन या खेल? — ढोल की पोल खोलता बेबाक ब्लॉग

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