मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

गीत (पास न जिनके आना-पाई)

 अक्षर-अक्षर जले दीप सा शब्द-शब्द मृदु-भोग मिठाई

सुनकर मन जगमग हो जाए ऐसा मधुर गीत दो माई।


जिसमें उत्सव-छटा दीप्त हो जो शुचिता का परिपोषक हो

देहरी-देहरी गंधित कर दे जो पीड़ा का अवशोषक हो

दुविधा में सुविधा बन उतरे हर अभाव में भाव परोसे

जिसको पढ़कर कहीं न सोए भूखा कोई रामभरोसे 

उनकी भी हो शुभ-दीपावलि पास न जिनके आना-पाई।


छद्म भूत-यशगान न जिसमें साँचा गौरवगान स्वरित हो

वर्तमान हो प्रगतिशील नित कल सुखमय हो आशान्वित हो

जिसमें श्रम के श्वेदबिंदु से अभिसिंचित आशा का फल हो

सुलभ सभी को रहें निबाले भले कर्मरत पल प्रतिपल हो

वे भी सौ-सौ दीप जलाएँ जिनके पास न दियासलाई।


स्वयं उतर आए कागज पर  सोख-सोख आँसू की स्याही

स्वयं मुखर हो गाए निस्पृह पीड़ा दुखियों की अनगाई

आकुल अधरों पर धर जाए मंद-मंद मुस्कानें अनगिन 

वह जो मन त्योहारी कर दे और भुला दे सारे दुर्दिन 

धनी और निर्धन की पाटे पल भर में ही चौड़ी खाई।


स्वर्ण-कलश कब सोचे कब हैं मन में रत्नजड़ित आभूषण

पैठे अपने चित्-चिंतन में केवल भूख और भोजन-कण

तृप्ति न दे तो तृप्ति सरीखा जो अतुल्य आभाष जगा दे

तृषा न मेंटे तो पानी में कुछ करने की आग लगा दे। 

और नहीं तो इतना कर दे सिखा सभी को आँखर ढ़ाई। 

©️ सुकुमार सुनील

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