शनिवार, 3 दिसंबर 2022

गीत (अब क्या बादल बरसाए से?)

 सूख चुका तन प्राण मूल मन अब क्या बादल बरसाए से?


वाट जोहते रैना वीतीं रही चाँदनी सदा सालती

सूरज की निर्मोही किरनें अंग-अंग में आग बालतीं।

आँखों में तुम ही तुम थे बस अब क्या आँसू ढलकाए से?


रही हृदय में सदा याचना सारे स्वप्न मूर्त कर दोगे

नेह-मेह अंतर बरसाकर आँचल में खुशियाँ भर दोगे।

स्वासा ही जब मौन हो गई अब क्या अमरित छलकाए से? 


पोर-पोर में प्यास जगी थी रोम-रोम था तुम्हें ताकता 

भूल गया था सुध-बुध सारी सुधियों में भी एक जाप था।

तुम आओगे, पर न आ सके अब क्या यह विप्लव लाए से?


इतनी भी क्या रही व्यस्तता थोड़ा आते-जाते रहते

सूख न पाता कंठ मीत तुम थोड़ा नेह जताते रहते।

तप्त भस्म पर अब क्या प्रियवर पूरा सागर उतराए से?

©️सुकुमार सुनील

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