रविवार, 11 दिसंबर 2022

सजल(सत्य से नित डर रहे हैं हम सभी)

 स्वार्थ के पथ पर चरण निज धर रहे हैं हम सभी

सत्य है यह सत्य से नित डर रहे हैं हम सभी। 

स्वयं ही हैं लक्ष्य तो निज हाथ में बंदूक है 

मारने उनको चले हैं मर रहे हैं हम सभी।

तन तो उज्ज्वल हो गए उर-भावना दूषित रही

व्यर्थ का शृंगार यह जो कर रहे हैं हम सभी। 

यह समय का युद्ध है प्रिय जीतना दुर्लभ बहुत 

एक ही तो घाट पानी भर रहे हैं हम सभी। 

ठहर कर मन-पथिक को किंचित सही विश्रांति दो

जब से चले हैं सतत ही विचर रहे हैं हम सभी। 

कर उपेक्षा ब्रह्म-रस की प्यास लेकर रक्त की

शुष्क पीले-पल्लवों से झर रहे हैं हम सभी। 

आँख में पानी बहुत है किंतु अपनों के लिए 

बूँद बन सुकुमार दो-एक ढर रहे हैं हम सभी। 

©️ सुकुमार सुनील

सजल (सच का अनुसंधान करेंगे)

 *अनंतिम पत्रिका हेतु ---*


〰️🍥 *सजल*🍥 〰️

    

*तथ्यों का सम्मान करेंगे*

*सच का अनुसंधान करेंगे*


श्वास हमारी कंठ तुम्हारा

मिलकर मंगलगान करेंगे


*बहने दो ये विषधाराएँ*

*हम शिव हैं विषपान करेंगे*


संकल्पों के पर्वत हैं हम

अंबर का अनुमान करेंगे


निष्ठुरता बलवती हुई है

चलो दया का दान करेंगे


*धरा छोड़ सुकुमार उड़ चले*

*उनकी विफल उड़ान करेंगे*

                  *--- सुकुमार सुनील*

                  फिरोजाबाद (उ०प्र०)

©️सुकुमार सुनील

ग़ज़ल (झूठ का यह वन घना है)

 झूठ का यह वन घना है

देखकर सच अनमना है।

मन मनु़जता का व्यथित है

रण दनुजता से ठना है।

अश्रु से कैसे पिघलता

मनुज लोहे का बना है।

पुष्प हैं कलियाँ भ्रमर हैं

राग ही तो पनपना हैं।

प्रेम बरसे भी तो कैसे

अहम् का अम्बर तना है।

रोटियाँ देंगे तुम्हें

कानून संसद में बना है।

आश्वासन मित्रवर यह

पूर्णतः थोथा चना है।

काँच से 'सुकुमार' निर्मित

भवन तो ये चटखना है।

©️सुकुमार सुनील

ग़ज़ल (ये पागल आवारा मन)

 एक हवा के झोंके जैसा ये पागल आवारा मन

कली-कली और फूल-फूल पर फिरता मारा-मारा मन

गाँव-शहर पर्वत-नदिया नभ धूप-छाँव हर एक परिस्थिति 

जाने कितना भटका  है और भटकेगा बंजारा मन

साँसों का सौदागर बेचे जीवन नये-नये रंग के 

गली-गली आवाज लगाता लौट-लौट दोबारा मन

सारे लोक घूम आता है पलभर में ये द्रुतगामी 

दौड़ रहा बिन-पग बिन-पथ ही है विचित्र हरकारा मन

©️सुकुमार सुनील

ग़ज़ल (स्याह निकले जो कहकर उजाले मिले)

 *उजाले मिले....*


स्याह निकले जो कहकर उजाले मिले

तेज़ छुरियों से भी भोले-भाले मिले।


देखकर हम निशां  जिनके चलते गए

पैर वो दूसरों के हवाले मिले।


देके हमको गये वो जहाँ का पता

उन घरों पर पड़े सिर्फ ताले मिले।


दे रहे थे हमें राह फूलों भरी

चल पड़े तो नदी और नाले मिले।


दर-बदर जन्म भर हम भटकते रहे

तब कहीं पेट को दो निबाले मिले।


उनको बैठे बिठाये गगन मिल गया

चलने वालों को पैरों में छाले मिले।


जान खेतों में 'सुकुमार' लेकर खड़े 

भूख से पस्त वे गाँव वाले मिले।

©️सुकुमार सुनील

ग़ज़ल (वो जो बन ठन के अगर आएगा)

 ज़लज़ला बनके कहर ढाएगा

वो जो बन-ठन के अगर आएगा।


अश्क उस आँख से ढलका जो अगर

पानी, पानी का उतर जाएगा।


आस का दीप जो जला रख्खा है

रोशनी ज़िस्म में भर जाएगा ।


अब न रफ़्तार हवाओं में वो है

ये भी तूफ़ान गुज़र जाएगा। 


ये इधर तो वो उधर इस क़दर

ना जाने कौन किधर जाएगा।


रात कितनी वो सुहानी होगी

चाँद को चाँद नज़र आएगा।


वक्त हसरत को न समझ पाया गर

दिल-ए 'सुकुमार' विखर जाएगा ।

©️सुकुमार सुनील

ग़ज़ल (वही फूल सा मन दे दो)

 वही फूल सा मन दे दो

मुझे मेरा बचपन दे दो।


निश्छल उर जिसमें मुस्काता

वह मधुरिम धड़कन दे दो।


प्राणों की लय में रसवंती

स्वाँसों की  सरगम दे दो।


कोमल तन कोमल भावों की

कोमलकाँत छुअन दे दो।


लौटा दो मेरा भोलापन

कंचों की कचकन दे दो।


अल्हड सा 'सुकुमार' मुझे 

वही निठल्लापन दे दो।

©️सुकुमार सुनील

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