25-10-2024
आना जो कोई ग़म नया तो सोचके आना
शब्दों से सजाकरके तुम्हें गीत न कर लूँ।
पेशा सा हो गया है मेरा तुमको उठाना
काँटों से कहीं गुल की तरह प्रीत न कर लूँ।।
स्याही नहीं तो क्या हुआ तू चल मेरी कलम
लिखनी है तुझको दास्ताँ जो खून से लिख दे।
होने न पाए दर्द की जमात ज़िंदगी
हर दर्द को निखारकर सुकून से लिख दे
हर चीख हर पुकार हर कराह तू सुनले
हर आह को महफिल का मैं संगीत न कर लूँ।
काँटों से कहीं गुल की तरह...
कहता नहीं किसी से मैं लिख लेता हूँ तुझे
ऐ ज़िंदगी तू मौत के दरिया से कम नहीं
सह करके कुछ भी आ गया है हँसने का हुनर
रोए जो मेरी जाँ कि दिल मेरा हुकुम नहीं
पलकों पे उतरने से पहले आँसुओ सुनलो
आना सँभलके आँख को मैं सीप न कर लूँ।
काँटों से कहीं गुल की तरह...
जीना सिखा दिया है तुमने मुझको दोस्तो
ओ आँधियो, तूफ़ान ओ, ओ दौरे ज़लज़लो!।
बहती है मेरे दिल में नज़्मो-ग़ज़ल की गंगा
रोको तो खुद को रोक लो सँग-सँग न बह चलो।
मैं गीत से नवगीत फिर प्रगीत की तरह
छंदों की तुमको ही नई तरकीब न कर लूँ।
काँटों से कहीं गुल की तरह...
चल तो रहा हूँ राह पर दुश्वार बहुत हैं
ज़ख़्मों से बह रहे हैं कई तौर के नग्मे।
हर मोड़ पे खड़े हैं यारो काफिये-रदीफ
ज़िंदगी की बहर जो पग-पग हैं पलटते।
लाचारियों ने रखना सिखा दी है तसल्ली
खामोशियो तुमको ही अपनी जीत न कर लूँ।
काँटों से कहीं गुल की तरह...
©️ सुकुमार सुनील
शनिवार, 30 नवंबर 2024
गीत : काँटों से कहीं गुल की तरह प्रीत न कर लूँ
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