शनिवार, 30 नवंबर 2024

गीत :यादों की झंझाएँ लेकर देखो चक्रवात आया है

 25-10-2024


यादों की झंझाएँ लेकर

देखो चक्रवात आया है 


रौद्र रूप ले लिया पवन ने

रिमझिम ने हुंकार भरी है 

हाँव-हाँव हूआँ-हूआँ की 

पेड़ों ने आवाज धरी है 

गरज रहे हैं धरती-अंबर 

सागर रूठा है 

किसी विरहिणी या विरही का 

दिल फिर टूटा है

भग्न सभी आशाएँ अपनी

या खण्डित विश्वास समूचे

यादों की झंझाएँ लेकर 

देखो चक्रवात आया है। 


अग्निदाह को देख सती के 

शिव का ताण्डव सर्व विदित है 

सत्यभान के प्राण बचाने 

सावित्री का प्रण अविजित है 

प्रणय पवन का किसी लहर से

शायद छूटा है 

इसीलिए लगता लहरों का 

गुस्सा फूटा है 

ज्वारों को बाहों में बाँधे 

भाटों को पग तले कुचलता

हाहाकार उठा सागर से

भू पर वायुपात लाया है।


या प्रकृति के मन में कोई

क्रीड़ा का भूचाल उठा है

धरती-बादल-वायु-सिंधु ने

मिलकर कोई खेल रचा है

लहरों ने मिलकर बेचारे

तट को लूटा है

अस्त-व्यस्त पशु-पक्षी-जंगल

इमली बूटा है

त्राहि-त्राहि चिल्लाता जन-जन

तितर-बितर घट-औघट-पनघट

रूप भयंकर घन प्रलयंकर

लेकर जल-प्रपात आया है।

देखो चक्रवात आया है...


©️ सुकुमार सुनील

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