शनिवार, 30 नवंबर 2024

गीत: समझ न पाता तो तुमको

 28-05-2024


रूप-गंध-रस से परेय है अनुपम सा आभास शुभे!

देह यष्टि में उलझा रहता समझ न पाता तो तुमको ।


मिली मौन में मुझे मधुरता और अनछुए कोमलता

घंटों तक खोया रहता हूँ सोच तुम्हें ओ! योग-लता

अनदेखे देखे लगते हो और अनसुने सुने-सुने

पुष्प कोई रख गया हथेली पर उपवन ज्यों स्वयं चुने


भटक रहा था पथ आ पहुँचा खुद ही पदचापें सुनकर 

चुनता भी मैं क्या निश्चित था? चुन ही पाता तो तुमको। 

देह यष्टि में उलझा रहता...


नए-नए होकर लगते हो एक पुराना अनुभव तुम

असंभाव्य होकर हो उर के तंतु-तंतु में संभव तुम

बाहों में है बाँह न मेरे हाथों में है हाथ तुम्हारा

हर एकाकीपन में मेरे किन्तु साथ है साथ तुम्हारा


साथ कि बिल्कुल धड़कन जैसा सतत निरंतर स्वर-लयमय

नयन खोजते क्या निश्चित था? पा ही पाता तो तुमको। 

देह यष्टि में उलझा रहता...


प्राप्य और अप्राप्य से परेय राग और वैराग्य न तुम हो

कहाँ कर्म के वशीभूत तुम भाग्य और दुर्भाग्य न तुम हो

प्राणवायु सम सदा समाहित तुम जल-थल में और गगन में

जाने कैसे? किन्तु सुभाषित तन में मन में और जीवन में


सरल विरल अविरल थे तुम तो मलय पवन के झोकों से 

क्या निश्चित था? सासों में निज भर ही पाता तो तुमको। 

देह यष्टि में उलझा..


©️ सुकुमार सुनील

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