सोमवार, 21 अगस्त 2023

गीत : जी लो तो जी लो

 बहुत कठिन है जीवन भैय्या जी लो तो जी लो

वरना किसको यहाँ पड़ी कि  तुम खा लो पी लो।


बदल रहे हैं युग, युग के सँग युग की तस्वीरें 

बढ़ी मशीनें किन्तु घटी हैं आपस की पीरें। 

कौन कहाँ रखता है चिंता किसकी आपस में 

फटे गूदड़ी अपनी खुद ही सीं लो तो सी लो।

बहुत कठिन है जीवन भैय्या जी लो तो जी लो... 


पहले ताप किसी को आती सब आ जाते थे

बैठ के ताऊ पड़ोस वाले सिर सहलाते थे।

आज शोक में भी  बैठे हैं रंजिश मान बड़ी

कौन पूछता है पानी की पी लो तो पी लो।

बहुत कठिन है जीवन भैय्या जी लो तो जी लो...


दो हिस्सों में बँटा किंतु फिर कुनबों में टूटा

धीरे-धीरे गाँव बेचारा घर-घर में फूटा।

एकाकी हो गए सभी को बस अपनी चिंता

कंठ कलेऊ कहाँ उतरता ली लो तो ली लो।

बहुत कठिन है जीवन भैय्या जी लो तो जी लो...

©️ सुकुमार सुनील

गीत : गगन से बरस रहा है प्यार

 झमाझम बारिश की रफ़्तार

कि धरती गाए गीत-मल्हार।

लताएँ हिल-मिल करें किलोल

गगन से बरस रहा है प्यार।। 2


सजन आओगे आस नहीं

धैर्य अब बिल्कुल पास नहीं।

राह मेघों ने कीं अवरुद्ध

साँस का छिड़ा साँस से युद्ध।


न कोई और यहाँ अवलम्ब

करूँ बस बूँदों से अभिसार।

गगन से बरस रहा है प्यार...


ये कदली आम गुलाबी फूल

चिढ़ाए भ्रमर कली पर झूल।

मिलन की लागी ऐसी लगन

पीहु पपिहा की भरती अगन।


अगन जो मन को करती मगन

बनाती यादों को त्योहार।

गगन से बरस रहा है प्यार...


भरे हैं नदी-नबारे-ताल

ताल जो मन को करे अताल।

न भाती कजरी और न गीत

पुकारे चाह मीत ही मीत।


मीत तुम भूले कैसे प्रीत?

प्रीत की कर दो आ बौछार।

गगन से बरस रहा है प्यार....


चूहती ओसारे से बूँद

देखकर लेती आँखें मूँद।

सालता आँसू का आभास

नयन से तेरे ओ मधुमास!


मास यह बीता जाए खास

बहा दो आकर तुम रसधार।

गगन से बरस रहा है प्यार...


©️सुकुमार सुनील

गीत : हो सके तो साथ रखना

 रह सकें अक्षुण्य बन मेरे हृदय में

ये सदा संचित, शुभग शुभकामनाएँ

इसलिए मुझसे नहीं आभार होगा

किंतु मेरा मन यही हर बार होगा।

हो सके तो साथ रखना


चाह है सुरभित रहें संबंध सारे

हो कोई भी भूल मुझको माफ करना

वह कुटिल परिपक्वता न है न चाहूँ 

तुम मुझे शिशु ही समझ इंसाफ करना। 

है बहुत संकोच कुछ भी माँगने में 

इस लिए मत सोचना क्या माँग लूँगा? 

यह मेरी उँगली कभी भी छोड़ना मत

बस तुम्हारे साथ को सब मान  लूँगा। 



है कोई भी वस्तु इतनी कीमती कब? 

आपका आशीष ही उपहार होगा।

हो सके तो साथ रखना। 


आपका यह स्नेह पाकर मन मुदित है

विहँसने हैं लग गए रग-रोम सारे

हो गया है स्वर्ग सा परिवेश पूरा

और प्रमुदित हो रहे भू-व्योम- तारे।

तार मन के हो के झंकृत कह रहे हैं

प्यार कितना आह! इस जग में भरा है

मात-पितु-गुरुगण सभी हैं साथ पल-पल

हाथ जबसे आपने सिर पर धरा है।


पा सका कण भर जगह यदि उर-उदधि में 

श्रेष्ठ क्या इससे कोई अभिसार होगा। 

हो सके तो साथ रखना।


स्वर्ग से टूटा हुआ तारा कहो या

तुम किसी शुभ देव का अभिशाप समझो

मनुज से मैं देवता बनने चला हूँ

किस तरह और क्या करोगे? आप समझो।

प्राण का दीपक निरंतर जल रहा है

रोज झंझाएँ इसे झकझोरतीं हैं

स्वास को ही स्वर भजन का ॐ धुन का 

चल दिया करने मगर मन मोड़तीं हैं। 


पार्थ सा मैं दिग्भ्रमित हो सारथी सब

तब उचित उपदेश ही आधार होगा। 

हो सके तो साथ रखना। 


©️ सुकुमार सुनील

गीत: समंदर बह गया होता

तनिक सी इक लहर में यह समंदर बह गया होता
किनारा ताकता ही मुँह क्षितिज का रह गया होता।

कि वह जो मिल गया है आस का पर्याय बन करके
कि वह जो घुल गया है स्वास में मधुमास बन करके।
कि वह जो बनके परछांई हरइक क्षण साथ है मेरे
कि जिसके नयन बनकर दीप पग-पग पंथ हैं घेरे।

कि जिसने संचयित की सहजता की जाह्नवी उर में 
कि उसकी चेतना का ज्वार पल में ढह गया होता।
किनारा...

कि जिसने समर्पण को ही समर्पित कर दिया जीवन
कि जिसने एक कल्पित देवता को दे दिया तन-मन। 
कि जिसने कर लिया है तन कलश मन थाल पूजा का
कि जिसकी अर्चना ही प्रेम है फिर भाव दूजा क्या?

कि जिसने स्नेह को साधा समझकर श्रेष्ठ हर तप से
लगा चिर साधना में लीन सा वह रह गया होता।
किनारा...

कि जो संवेदनाओं के मृदुल मधुपर्क से सिंचित
कि जिसके मौन में है सृष्टि का ठहराव सा किंचित। 
कि वह जो बूँद सा आ मिल गया लवणीय इस जल में 
कि वह जो फूँक देता प्राण मेरे प्राण में पल में। 

कि जिसकी निकटता हर कष्ट को बौना बना देती
कि चिर अलगाव को वह नाम मेरे  कर गया होता। 
किनारा... 
©️ सुकुमार सुनील

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