सुख तो सुख थे जग से मेरे दुःख भी नहीं पचे
कैसे रोऊँ? अब आँखों में आँसू नहीं बचे।
देख नयन में नमी आँख छुटकी भर लाती है
छोटू की व्याकुलता मुझसे सही न जाती है।
कई दिनों तक टीस भूख की वे सह जाते हैं
बाद प्रतीक्षा के नित ही भूखे सो जाते हैं।
हाय राम! कैसे सहता हूँ इतनी लाचारी
दुनिया को हँसना क्या मेरे रोदन नहीं जँचे।
कैसे रोऊँ? अब आँखों में आँसू नहीं बचे.....
सुस्त देखता जब भी मालिक मुझ पर झल्लाता
कल से काम न करने आना मुझको धमकाता।
सहानुभूतियों वाले जैसे दिन ही चले गए
जीवन, मृत्यु न जाने किसके हाथों छले गए?
एक जान के साथ बँधीं हैं तीन-तीन जानें
इसीलिए ही बस फाँसी के फंदे नहीं रचे।
कैसे रोऊँ? अब आँखों में आँसू नहीं बचे.....
कहते हैं सब काम बहुत है करने वालों को
कौन पढ़ेगा आकर मेरे मौन मलालों को।
खाक छानता फिरता दर-दर सबकी सुनता हूँ
एक-एक दाना चिड़िया के जैसे चुनता हूँ।
एक भूल की थी बचपन में शिक्षा पा न सका
इसीलिए दोपहर दुःख के अब तक नहीं लचे।
कैसे रोऊँ? अब आँखों में आँसू नहीं बचे.....
करूँ प्रतिज्ञा अब यदि मैं जीवित रह पाऊँगा
भूखा रह लूँगा बच्चों को किंतु पढ़ाऊँगा।
यह कलंक जो मुझे मिला है इसे मिटाना है
अपने छोटू और छुटकी को योग्य बनाना है।
सेवा का हो भाव और अवसर भी खूब मिलें
उनके जीवन में अभाव का ताण्डव नहीं मचे।
कैसे रोऊँ? अब आँखों में आँसू नहीं बचे.....
सुख तो सुख थे जग से मेरे दुःख भी नहीं पचे ।
©️ सुकुमार सुनील
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