गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

गीत: ये सलोने गीत की उनहार लड़के

 10-10-2022

शुष्क से दिखते सदा हर आर्द्रता सह

हैं नदी के पत्थरों से यार लड़के

स्वप्न का संसार सीने में सँजोए

ये सलौने गीत की उनहार लड़के।


मुस्कराहट में छिपाकर मौन कुण्ठा 

वेदनाएँ भर असीमित चल रहे हैं

है डगर अनजान पग-पग पर अँधेरा 

दीप जैसे स्वयं पल-पल जल रहे हैं।

विवशताएँ नियम शाश्वत हो गईं हैं 

पात्र सह-अनुभूति के कम ही रहे ये

हो गए दायित्व के आदी हैं काँधे

सूर्य जैसे नित्य ही उग-ढल रहे हैं। 

भावना को छंद में बाँधे हुए से

कल्पना का काव्यमय व्यापार लड़के।


क्या करे मन पल नहीं वैराग्य के ये? 

प्रातः सी कमसिन अवस्था गुनगुनी है 

मोड़ पर हर है ठिठकना सहज फिर भी

चाह में इनकी कि ज्यों संजीवनी है।

हो गए अभ्यस्त हैं पग ठोकरों के 

राह के कंकड़ इन्हें पहचानते हैं 

इसलिए दिन-रात इनको एक जैसे

धूप भी इनके लिए तो चाँदनी है। 

अनगिनत नयनों में तट बनकर बस ये

जग-सरित में तृण-सरिस पतवार लड़के ।


श्वेद में भीगे सबेरे, साँझ इनके

अरुणिमा नभ की कि अपलक ताकते हैं

शक्ति का संचार हो अनवरत तन में

धूल को कर स्वर्ण-भस्मी फाँकते हैं।

ब्रह्ममहूरत ही नहीं हर पहर इनके

स्वाँस की धुन सुन नयन निज खोलता है

तोड़ हर अवरोध झुकते और झुकाते

ये सतत मुड़ते-मुड़ाते चल रहे हैं 

बह रहे उठ-उठ औ गिर-गिर जल सरीखे 

दो तटों के मध्य सँकरी धार लड़के ।

©️ सुकुमार सुनील

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