गुरुवार, 17 नवंबर 2022

गीत (हम जीभर कर भेंट न पाए)

 मन से मन को मेंट न पाए

हम जीभर कर भेंट न पाए। 

जग में इतना प्यार हमीं क्यों

जाने भला समेंट न पाए।।


जल में दीपक विम्ब सरीखे

तुम तो पल-प्रतिपल जगमग थे।

लहरों से अठखेली करते

भूल गए सारा अग-जग थे।

झंझाओं से डरकर हम ही

नौका पर आसीन हो गए 

हाथ हमारे ही द्युति पाने

जल में गहरे पैठ न पाए।


चुपके से पल्लव पर उतरे

तुम पावन प्रातः के मोती।

नील-गगन सा गात तुम्हारा

पहने पीत किरन की धोती।

कटु कलुषित स्पर्श हमारा

छूकर छूमंतर कर डाला

दिव्य दीप्ति शुचिता पूरित वह

शापित नेत्र समेट न पाए।


तुमने फूल-फूल महकाया

कलियों पर योवन बर्साया।

नाना रूप और रंगो से

जग को सुंदर-सुगढ़ बनाया।

अभिशापित अपना ही अंतर

ऊपर ओढ़े मैली काया 

हम हीं निपट मूँढ कंचन के

शुचि साँचे में बैठ न पाए।

©️ सुकुमार सुनील 

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Bahut sundar

Sukumar Sunil ने कहा…

बहुत-बहुत हार्दिक धन्यवाद 🙏

Sukumar Sunil ने कहा…

कविता का रसास्वादन करने वाले सभी सदस्यों का हार्दिक धन्यवाद व अभिनंदन 💐 💐 💐 🙏😊

बेनामी ने कहा…

👌👌

भारतीय रेल: परिवहन का सुगम साधन या खेल? — ढोल की पोल खोलता बेबाक ब्लॉग

 भारतीय रेल: परिवहन का सुगम साधन या खेल? — ढोल की पोल खोलता बेबाक ब्लॉग प्रस्तावना: रेल — जीवनरेखा या सिरदर्द? भारतीय रेल को हमेशा गरीब और म...