शनिवार, 30 नवंबर 2024

गीत :किंतु यह दीपक अकेला टिमटिमाता जल रहा है

 30-10-2024

किंतु यह दीपक अकेला 

टिमटिमाता जल रहा है 

हाथ अपने मल रहा है। 


पेड़ों के झुरमुट के पीछे

आम के, पीपल के नीचे। 

और उस तालाब में भी

इस विपिन उस बाग में भी। 

जल रही दीपावली है

बज रही भजनावली है। 

पंक्तियों में बैठ सारे 

दीप हिलमिल गा रहे हैं। 

किंतु यह दीपक अकेला

टिमटिमाता जल रहा है। 

हाथ अपने मल रहा है - 2


हर गली में हर भवन में

शुभ लगन में शुभ्र मन में। 

पूर्वजों के थान पर भी

देव के स्थान पर भी। 

चौखटों पर सींकचों में

बालकनियों पर गचों में। 

एक स्वर में दीप सारे

झिलमिलाते गा रहे हैं। 

किंतु यह फिर भी अँधेरा

जाने क्योंकर पल रहा है।

हाथ अपने मल रहा है...


दूर उस नीले क्षितिज पर

हर नदी के पाट, ब्रिज पर।

और सागर के किनारे

झील-झरनों के सहारे। 

जल रही हैं ज्योति जगमग 

और तारे-नयन सँग-सँग। 

मुस्कराते सुगबुगाते 

खिलखिलाते जा रहे हैं। 

किंतु यह दीवा विजन में 

मोम जैसा गल रहा है।

हाथ अपने मल रहा है...


जल रहे जन में विजन में

दासता में बागपन में। 

गंध में दुर्गंध में भी

सहजता में फंद में भी। 

जल रहे छल में कि बल में

जल रहे उर हैं विमल में।

हर तरफ उजियार का ही

लग रहा है बोलबाला। 

शेष यह अँधियार फिर क्यों

मीत रह-रह खल रहा है।

हाथ अपने मल रहा है...

©️ सुकुमार सुनील

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