सोमवार, 12 दिसंबर 2022

ग़ज़ल (जानते हैं सब तुम्हें कितने भले हो?)

 जानते हैं सब तुम्हें कितने भले हो? 

तुम सदा ही भीड़ में छिपकर चले हो। 


काम करने का सलीखा तक नहीं है

रोल मॉडल खाम-ए-खां बनने चले हो।


हाँकते थे डींग कि आफताब हैं हम

जुगनुओं से ज्यादा तुम कब जले हो?


हो गया बस भी करो अब कद्रदानो

छल रहे हो जिनके टुकड़ों पर पले हो। 


हाँ सही है आज के तुम देवता हो 

बात पर टिकते नहीं हो दोगले हो। 


मौत छूकर मर गई कितनी दफ़ा उफ्फ 

सुकुमार ऐसे खूब साँचे में ढले हो। 

©️ सुकुमार सुनील

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

शानदार

भारतीय रेल: परिवहन का सुगम साधन या खेल? — ढोल की पोल खोलता बेबाक ब्लॉग

 भारतीय रेल: परिवहन का सुगम साधन या खेल? — ढोल की पोल खोलता बेबाक ब्लॉग प्रस्तावना: रेल — जीवनरेखा या सिरदर्द? भारतीय रेल को हमेशा गरीब और म...