घुप्प अँधेरे में बैठे हैं पिता और महतारी
करे प्रतीक्षा कंस तुम्हारी आओ कृष्णमुरारी।
हाथों में हथकड़ी बेड़ियाँ पावों को जकड़े हैं
साँस-साँस पहरुए क्रुद्ध हो घूरें और अकड़े हैं।
गरज रहे हैं अहंकार के बादल बड़बोले वे
उगल रहीं हैं आग बिजलियाँ अपना मुँह खोले वे।
खड़े हुए हैं हतप्रभ सारे ब्रजवासी भय-आतुर
सुनो प्रार्थना आप पधारो ले बंशी बनवारी।
करे प्रतीक्षा कंस तुम्हारी....
सबके मुँह पर पड़े हुए हैं, हाँ नृप-भय के ताले
जो बोलेगा उसे पड़ेंगे निज प्राणों के पाले।
वह अनीति का और नीति का अंतर भूल गया है
नियति भूलकर सही-गलत के भ्रम पर झूल गया है।
बढ़ता पापाचार टिकीं हैं आँखें सबकी तुम पर
तोड़ के फाटक अब कारा के आजाओ त्रिपुरारी।
करे प्रतीक्षा कंस तुम्हारी....
गहराती है घटा और हहराती है कालिंदी
मन-मलीन बसुदेव, देवकी की धूमिल है बिंदी।
त्राहि-त्राहि चिल्लाए जन-जन तन-मन सब व्याकुल हैं
नंदगाँव-गोकुल के सब, पशु-पक्षी शोकाकुल हैं ।
आशा की बस आप किरण हो तम को दूर भगाने
आओ मोरपंख सिर धरकर चक्र सुदर्शनधारी ।
करे प्रतीक्षा कंस तुम्हारी...
तुम आओगे ब्रजमंडल में खुशियाँ छा जाएँगीं
दानवीय प्रवृत्ति समूचीं ठाड़ी सकुचाएँगी।
अघा वका शकटासुर सारे और पूतना नारी
रहें न ये घर-घर महकेगी सुख की ही फुलवारी।
भेद बताने मीत वासना और प्रेम के बीच
हर आतप से रक्षा करने आओ प्रिय गिरिधारी।
करे प्रतीक्षा कंस तुम्हारी....
©️ सुकुमार सुनील
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